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|उपदेशप्रद कहानी: दान का रहस्य
दान में महत्त्व है त्याग का, वस्तु के मूल्य या संख्या का नहीं। ऐसी त्यागबुद्धि से जो सुपात्र यानी जिस वस्तु का जिसके पास अभाव है, उसे वह वस्तु देना और उसमें किसी प्रकार की कामना न रखना उत्तम दान है। निष्काम भाव से किसी भूखे को भोजन और प्यासे को जल देना सात्त्विक दान है। संत श्रीएकनाथजी की कथा आती है कि वे एक समय प्रयाग से कांवर पर जल लेकर श्रीरामेश्वरम् चढ़ाने के लिए जा रहे थे। रास्ते में जब एक जगह उन्होंने देखा कि एक गदहा प्यास के कारण पानी के बिना तड़प रहा है। उसे देखकर उन्हें दया आ गई और उन्होंने उसे थोड़ा-सा जल पिलाया। इससे उसे कुछ चेत-सा हुआ। फिर उन्होंने थोड़ा-थोड़ा करके सब जल उसे पिला दिया। वह गदहा उठ कर चला गया। साथियों ने सोचा कि त्रिवेणी का जल व्यर्थ ही गया और यात्रा भी निष्फल हो गई। तब एकनाथजी ने हंसकर कहा - ‘भाइयों, बार-बार सुनते हो, भगवान सब प्राणीयों के अंदर हैं, फिर भी ऐसे बावलेपन की बात सोचते हो! मेरी पूजा तो यहीं से श्रीरामेश्वरम् को पहुंच गई। श्रीशंकरजी ने मेरे जल को स्वीकार कर लिया।’

एक महाजन की कहानी है कि वह सदैव यज्ञादि कर्मों में लगा रहता था। उसने बहुत दान किया। इतना दान किया कि उसके पास खाने को भी कुछ न रह गया। तब उसकी स्त्री ने कहा - ‘पास के गांव में एक सेठ रहते हैं, वे पुण्यों को मोल खरीदते हैं, अत: आप उनके पास जाकर और अपना कुछ पुण्य बेचकर द्रव्य ले आइए, जिससे अपना कुछ काम चले।’ इच्छा न रहते हुए भी स्त्री के बार-बार करने पर वह जाने को उद्यत हो गया। उसकी स्त्री ने उसके खाने के लिए चार रोटियां बनाकर साथ दे दीं। वह चल दिया और उस नगर के कुछ समीप पहुंचा, जिसमें वे सेठ रहते थे। वहां एक तालाब था। वहीं शौच-स्नानादि कर्मों से निवृत होकर वह रोटी खाने के लिए बैठा कि इतने में एक कुतिया आई। वह वन में ब्यायी थी। उसके बच्चे और वह, सभी तीन दिनों से भूखे थे; भारी वर्षा हो जाने के कारण वह बच्चों को छोड़कर शहर में नहीं जा सकी थी। कुतिया को भूखी देखकर उसने उस कुतिया को एक रोटी दी। उसने उस रोटी को खा लिया। फिर दूसरी दी तो उसको भी खा लिया। इस प्रकार उसने एक-एक करके चारों रोटियां कुतिया को दे दीं। कुतिया रोटी खाकर तृप्त हो गई। फिर, वह वहां से भूखा ही उठकर चल  दिया तथा उस सेठ के पास पहुंचा। सेठ के पास जाकर उसने अपना पुण्य बेचने की बात कही। सेठ ने कहा - ‘आप दोपहर के बाद आइए।’

उस सेठ की स्त्री पतिव्रता थी। उसने स्त्री से पूछा - ‘एक महाजन आया है और वह अपना पुण्य बेचना चाहता है। अत: तुम बताओ कि उसके पुण्यों में से कौन-सा पुण्य सबसे बढ़कर लेने योग्य है।’ स्त्री ने कहा - ‘आज जो उसने तालाब पर बैठकर एक भूखी कुतिया को चार रोटियां दी हैं, उस पुण्य को खरीदना चाहिए; क्योंकि उसके जीवन में उससे बढ़कर और कोई पुण्य नहीं है।’ सेठ ‘ठीक है’ - ऐसा कहकर बाहर चले आए।

नियत समय पर महाजन सेठ के पास आया और बोला - ‘आप मेरे पुण्यों में से कौन-सा पुण्य खरीदेंगे?’ सेठ ने कहा - ‘आपने आज जो यज्ञ किया है, हम उसी यज्ञ के पुण्य को लेना चाहते हैं।’ महाजन बोला - ‘मैंने तो आज कोई यज्ञ नहीं किया? मेरे पास पैसा तो था ही नहीं, मैं यज्ञ कहां से कैसे करता।’ इस पर सेठ ने कहा - आपने जो आज तालाब पर बैठकर भूखी कुतिया को चार रोटियां दी हैं, मैं उसी पुण्य को लेना चाहता हूं।’ महाजन ने पूछा - ‘उस समय तो वहां कोई नहीं था, आपको इस बात का कैसे पता लगा?’ सेठ ने कहा - ‘मेरी स्त्री परिव्रता है, उसी ने ये सब बातें मुझे बताई हैं।’ तब महाजन ने कहा - ‘बहुत अच्छा, ले लीजिए; परंतु मूल्य क्या देंगे? सेठ ने कहा - ‘आपकी रोटियां जितने वजन की थीं, उतने ही हीरे मोती तौलकर मैं दे दूंगा।’ महाजन ने स्वीकार किया और उसकी सम्मति के अनुसार सेठ ने अंदाज से चार रोटियां बनाकर तराजू के एक पलड़े पर रखीं और दूसरे पलड़े पर हीरे-मोती आदि रख दिए; किंतु बहुत-से रत्नों के रखने पर भी वह (रोटीवाला) पलड़ा नहीं उठा। इस पर सेठ ने कहा - ‘और रत्नों की थैली लाओ।’ जब उस महाजन ने अपने इस पुण्य का इस प्रकार का प्रभाव देखा तो उसने कहा कि सेठजी! मैं अभी इस पुण्य को नहीं बेचूंगा।’ सेठ बोला - ‘जैसी आपकी इच्छा।’

तदनन्तर वह महाजन वहां से चल दिया और उसी तालाब के किनारे से, जहां बैठकर उसने कुतिया को रोटियां खिलाई थीं, थोड़े-से चमकदार कंकड़-पत्थरों तथा कांच के टुकड़ों को कपड़े में बांधकर अपने घर चला आया। घर आकर उसने वह पोटली अपनी स्त्री को दे दी और कहा - ‘इसको भोजन करने के बाद खोलेंगे।’ ऐसा कहकर वह बाहर चला गया। स्त्री के मन में उसे देखने की इच्छा हुई। उसने पोटली को होला तो उसमें हीरे-पन्ने-माणिक आदि रत्न जगमगा रहे थे। वह बड़ी प्रसन्न हुई। थोड़ी देर बाद जब वह महाजन घर आया तो स्त्री ने पूछा - ‘इतने हीरे-पन्ने कहां से ले आए?’ महाजन बोला - ‘क्यों मजाक करती हो?’ स्त्री ने कहा - ‘मजाक नहीं करती, मैंने स्वयं खोलकर देखा है, उसमें तो ढेर के ढेर बेशकीमती हीरे-पन्ने भरे हैं।’ महाजन बोला - ‘लाकर दिखाओ।’ उसने पोटली लाकर खोलकर सामने रख दी। वह उन्हें देखकर चकित हो गया। उसने इसको अपने उस पुण्य का प्रभाव समझा। फिर उसने अपनी यात्रा का सारा वृत्तांत अपनी पत्नी को कह सुनाया।

कहने का अभिप्राय यह कि ऐसे अभावग्रस्त आतुर प्राणी को दिए गए दान का अनंतगुना फल हो जाता है, भगवान की दया के प्रभाव से कंकड़-पत्थर भी हीरे-पन्ने बन जाते हैं।

इस प्रकार दीन-दु:खी, आतुर और अनाथ को दिया गया दान उत्तम है। किसी के संकट के समय दिया हुआ दान बहुत ही लाभकारी होता है। किसी के संकट के समय दिया हुआ दान बहुत ही लाभकारी होता है। भूकंप, बाढ़ या अकाल आदि के समय आपद्ग्रस्त प्राणी को एक मुट्ठी चना देना भी बहुत उत्तम होता है। जो विधिपूर्वक सोना, गहना, तुलादान आदि दिया जाता है, उससे उतना लाभ नहीं, जितना आपत्तिकाल में दिए गए थोड़े-से दान का होता है। अत: हरेक मनुष्य क आपत्तिग्रस्त, अनाथ, लूले, लंगड़े, दु:खी, विधवा आदि की सेवा करनी चाहिए। कुपात्र को दान देना तामसी है। मान-बड़ाई-प्रतिष्ठा के लिए दिया हुआ दान राजसी है; क्योंकि मान-बड़ाई-प्रतिष्ठा भी पतन करने वाली है। आज तो यह मान-बड़ाई हमें मीठी लगती है, पर उसका निश्चित परिणाम पतन है। अत: मान-बड़ाई की इच्छा का त्याग कर देना चाहिए, बल्कि यदि किसी प्रकार निंदा हो जाय तो वह अच्छी समझी जाती है। श्री कबीरदासजी कहते हैं -

निंदक नियरें राखिए, आंगल कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निरमल करै सुभाय।।

इसलिए परम हित की दृष्टि से मान-बड़ाई के बदले संसार में अपमान-निंदा होना उत्तम है। साधक के लिए मान-बड़ाई मीठा विष है और अपमान-निंदा अमृत के तुल्य है। इसीलिए निंदा करनेवाले को आदर की दृष्टि से देखना चाहिए; परंति कोई भी निंदनीय पापाचार नहीं करना चाहिए। दुर्गुण-दुराचार बड़े ही खतरे की चीज है। इसलिए इनका हृदय से त्याग कर देना चाहिए। अपने सद्गुणों को छिपाकर दुर्गुणों को प्रकट करना चाहिए। आजकल लोह सच्चे दुर्गुणों को छिपाकर बिना हुए ही अपने में सद्गुणों का संग्रह बताकर उनका प्रचार करते हैं, यह सीधा नरक का रास्ता है। अत: मान-बड़ाई की इच्छा हृदय से सर्वथा निकाल देनी चाहिए। संसार में हमारी प्रतिष्ठा हो रही है और हम यदि उसके योग्य नहीं हैं तो हमारा पतन हो रहा है। मान-बड़ाई-प्रतिष्ठा चाहनेवाले से भगवान दूर हो जाते हैं; क्योंकि मान-बड़ाई-प्रतिष्ठा की इच्छा पतन में ढकेलनेवाली है। मान-बड़ाई को रौरव के समान और प्रतिष्ठा को विष्ठा के समान समझना चाहिए। यही संतों का आदेश है।

 यह ध्यान रखना चाहिए कि सुपात्र को दिया गया दान दोनों के लिए ही कल्याणकारी है। कुपात्र को दिया गया दान दोनों को डुबानेवाला है। जैसे पत्थर की नौका बैठनेवाले को साथ लेकर डूब जाती है, उसी प्रकार कुपात्र दाता को साथ लेकर नरक में जाता है।

दान के संबंध में एक बात और समझने की है। बड़े धनी पुरुष के द्वारा दिए गए लाखों रुपयों के दान से निर्धन के एक रुपये का दान अधिक महत्त्व रखता है; क्योंकि निर्धन के लिए एक रुपये का दान भी बहुत बड़ा त्याग है। भगवान के यहां न्याय है। ऐसा न होता तो फिर निर्धनों की मुक्ति ही नहीं होती। इस विषय में एक कहानी है। एक राजा प्रजाजनों के सहित तीर्थ करने के लिए गए। रास्ते में एक आदमी नंगा पड़ा था, वह ठंड के कारण ठिठुर रहा था। राजा के साथी प्रजाजनों में एक जाट था, उसने अपनी दो धोतियों में से एक धोती उस नंगे आदमी को दे दी, इससे उसके प्राण बच गए। जाट के पास पहनने को एक ही धोती रह गई। आगे जब वे दूर गए तो वहां बहुत कड़ी धूप थी, पर उन्होंने देखा कि बादल उन पर छाया करते चले जा रहे हैं। राजा ने सोचा कि ‘हमारे पुण्य के प्रभाव से ही बादल छाया करते हुए चल रहे हैं।’ तदनन्तर वे एक जगह किसी वन में ठहरे। जब चलने लगे, तब किसी महात्मा ने पूछा - ‘राजन्! तुम्हें इस बात का पता है कि ये बादल किसके प्रभाव से छाया करते हुए चल रहे हैं?’ राजा कुछ भी उत्तर नहीं दे सके। तब महार्मा ने कहा - ‘अच्छा, तुम  एक-एक करके यहां से निकलो। जिसके साथ बादल छाया करते हुए चलें, इसको उसी पुण्यवान के पुण्य का प्रभाव समझना चाहिए।’ पब पहले राजा वहां से चले, फिर एक-एक करके सब प्रजाजन चले, पर बादल वहीं रहे। तब राजा ने कहा - ‘देखो तो, पीछे कौन रह गया है।’ सेवकों ने देखा कि वहां एक जाट सोया पड़ा है। उसे उठाकर वे राजा के पास लाए, तब बादल भी उसके साथ-साथ छाया करते चलने लगे। तब महात्मा बोले - ‘यह इसी पुण्यवान के पुण्य का प्रभाव है।’ राजा ने उससे पूछा - ‘तुमने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है?’ बार-बार पूछने पर उसने कहा कि मैंने और तो कोई पुण्य नहीं किया, अभी रास्ते में मैंने अपनी दो धोतियों में से एक धोती रास्ते में पड़े जाड़े से ठिठुरते एक नंगे मनुष्य को दी थी।’

इस पर महात्मा ने राजा से कहा - ‘राजन्! तुम बड़ा दान करते हो, परंतु तुम्हारे पास अतुल संपत्ति है, इसलिए तुम्हारा त्याग दो धोती में से एक दे डालने के समान नहीं हो सकता।’

इस प्रकार दान का रहस्य समझकर दान करना चाहिए।
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  • कर्ण की धर्मनिष्ठता

  • जानिए किन चार तरह के व्यक्तियों को नींद नहीं आती

  • सबसे बड़ा संयम है मौन

  • काशी के लोलार्क कुंड में विराजते हैं सूर्य

  • दैत्यराज विरोचन की दानशीलता

  • मर्यादा पालन क्यों ?

  • कन्हैया द्वारा शालग्राम की चोरी

  • योगमाया की भविष्यवाणी

  • बाल समय रबि भक्षि लियो

  • केवट के भाग्य

  • चित्रकूट की अद्भुत शोभा

  • समुद्रोल्लंघन की तैयारी

  • जानिए संकटमोचन हनुमान के जन्म की कथा

  • आखिर कैसे हुआ था भीष्म पितामह का जन्म

  • गंगापुत्र देवव्रत का नाम भीष्म कैसे पड़ा?

  • जब कुबेर को खुद पर होने लगा अंहकार

  • धर्म का रहस्य

  • प्रेम में है अपार शक्ति

  • अखंड सौभाग्य के लिए करें हरतालिका तीज व्रत

  • श्री गणेश से गजानन बनने की कहानी

  • कुरूपता सुंदरता के वस्त्र पहनकर चलती बनी

  • भगवती के दुर्गा नाम का इतिहास

  • भगवान गणेश के 8 अति प्राचीन मंदिर

  • विनम्रता में छुपा जीवन की सफलता रहस्य

  • जानिए श्राद्ध में क्या है पिंड दान का महत्त्व

  • जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत महिमा

  • मां शैलपुत्री

  • कलश स्थापना कैसे करें ?

  • मां ब्रह्मचारिणी

  • मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप- मां चंद्रघंटा

  • नवरात्र का चौथा दिन मां कूष्मांडा देवी

  • नवदुर्गा का पांचवां स्वरूप स्कंदमाता

  • कात्यायनी : मां दुर्गा का छठवां स्वरूप

  • नवरात्रि के सातवें दिन होती है होती है मां कालरात्रि की पूजा

  • शाकंभरी अवतार

  • नवरात्र के अाठवें दिन होता है मां महागौरी का पूजन

  • सिद्धिदात्री : मां दुर्गा का नौवां रूप

  • विजय दशमी

  • भावनाओं से ही तय होता है मनुष्य का भाग्य

  • जीत हमेशा सत्य की होती है

  • कार्तिक मास का महत्त्व

  • श्रीरामचरितमानस (लंकाकाण्ड)

  • करवा चौथ व्रत की पूजन विधि

  • करवा चौथ व्रत की कथा

  • गलतियों को सुधारने से जीवन आदर्श बनता है।

  • तो इसलिए पूजनीय है शमी वृक्ष

  • स्वार्थरहित होकर किया गया दान ही श्रेष्ठ

  • बिल्व वृक्ष का महत्त्व जानकर हैरान हो जाएंगे आप।

  • माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप

  • दीर्घजीवी होने का रहस्य विनम्रता में निहित

  • क्यों मनाया जाता है धनतेरस का त्योहार

  • चाणक्य नीति की कुछ महत्त्वपूर्ण बातें

  • आपका चरित्र ही सबसे बड़ा गुण है।

  • खुद कष्ट सहकर बगुले ने उपकार का बदला चुकाया

  • देवउठनी एकादशी आज

  • मार्गशीर्ष श्रीकृष्ण का स्वरूप

  • आशीर्वाद के लिए पैर ही क्यों छुआ जाता है?

  • खुशी तो मन में छुपी है।

  • आत्मा में निहित असली सौंदर्य

  • सत्संग का प्रभाव

  • सेहत का राज

  • संगत का असर

  • सोते वक्त किस दिशा में रखना चाहिए सिर और पैर ?

  • क्यों हैं श्रीविष्णु क्षीरसागर में?

  • नलकुबेर ने दिया था रावण को श्राप

  • बर्तन से पैदा हुए थे गुरु द्रोणाचार्य

  • सेवा भाव सभी धर्मों से ऊपर

  • मां के 51 शक्तिपीठों की एक पौराणिक कथा

  • पूजा-पाठ करने की सही तरीका

  • ऐसे करें गणेश जी की पूजा

  • पुण्यदायक है माघ स्नान

  • श्रीयंत्र है मां लक्ष्मी को परम प्रिय

  • क्यों मनाते है मकर संक्रांति, क्या है महत्त्व

  • रामचरितमानस

  • धैर्य का फल

  • तिल के फायदें

  • अनोखी शिक्षा

  • शादी से समय क्यों लेते है अग्नि के सात फेरे

  • श्रेष्ठ कौन

  • मौनी अमावस्या आज

  • कर्म की महिमा

  • हर एक को अपना दु:ख सबसे बड़ा लगता है

  • सरस्वती को वाणी की देवी क्यों कहते हैं?

  • जानिये मां सरस्वती का जन्म कैसे हुआ..

  • जानें क्या है तुलसी के पौधे का महत्त्व

  • निर्विकार भाव से मिलता है सुख

  • क्षमाशीलता

  • मंथरा की कुशिक्षा

  • वक्रतुण्ड अवतार

  • क्यों मनाई जाती है शिवरात्रि

  • ज्ञानी बने पर अंहकारी न बने

  • जानिए क्या है होलाष्टक

  • असली सुंदरता हमारे अच्छे कार्यों से आती है।

  • पूजा में केले के पत्तों को क्यों महत्व दिया जाता है?

  • आज है शनि प्रदोष व्रत

  • अष्टमी पर करें मां महागौरी की उपासना

  • रामनवमी क्यों मनाई जाती है?

  • महात्मा विदुर की अंतिम इच्छा

  • श्री राम के साथ करें, भगवान शिव की उपासना

  • जानिए कर्ण को क्यों मिला श्राप

  • यज्ञ कर्म

  • आप भी कर लें संकटमोचन को प्रसन्न

  • हनुमान अष्टक

  • अर्जुन के रथ पर क्यों बैठे थे हनुमान?

  • श्रीगणेश के 11 नाम

  • तो इसलिए मनाते है बैसाखी

  • जलियांवाला बाग कांड की कुछ बड़ी बातें जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता

  • हिंदू धर्म की कुछ महत्वपूर्ण बातें जिसे आपको भी जानना चाहिए

  • परब्रह्म शिव ही परमात्मा हैं

  • श्रीकृष्ण को श्राप से बचाने के लिए सुदामा ने स्वीकारी थी उम्रभर की दरिद्रता

  • हनुमानजी के पुत्र मकरध्वज की उत्पत्ति की कथा

  • कपूर के है अनेकों फायदे

  • शनिवार को क्यों चढ़ाते हैं शनि देव को तेल

  • कुरुचिपूर्ण स्वभाव से बचें

  • शिव को क्यों प्रिय है भांग

  • दूसरों के हिस्से का भोजन न खाएं

  • जानिए महात्मा विदुर ने किन 6 चीजों का होना भाग्यशाली बताया है।

  • जो है उसमें खुश रहना सीखें

  • निंदक नियरे राखिए

  • क्यों मनाते हैं अक्षय तृतीया

  • गंगा सप्तमी आज

  • कन्या दान का महत्त्व

  • जानिए कौन सा फूल चढ़ाने से कौन से भगवान होते हैं प्रसन्न?

  • भगवान विष्णु के दस अवतार 1.मत्स्यावतार

  • भगवान विष्णु के दस अवतार:-

  • भगवान विष्णु के दस अवतार:- वराहावतार

  • भगवान विष्णु के दस अवतार:- नृसिंह अवतार

  • अपने आप को मुश्किलों से बड़ा बनाएं

  • भगवान विष्णु के दस अवतार:- वामन अवतार

  • कर्म की गति और मनुष्य के मोह

  • हमारी संस्कृति में यज्ञ का महत्व

  • जानिए किसने की थी निर्जला एकादशी की शुरुआत

  • भगवान गणेश को क्यों नहीं चढ़ाते तुलसी ?

  • क्यों है ब्रह्मा जी का भारत में एक मंदिर ?

  • कैसे हुई थी रुद्राक्ष की उत्पत्ति ?

  • रावण के तीन गुणकारी मंत्र

  • "नंदी के अबोध आचरण ने किया भोलेनाथ को क्रोधित"

  • "भगवान शिव के चार साथी"

  • "हनुमान जी ने सुनी अंजलि की पुकार"

  • आज है हरियाली तीज, 108वें जन्म मे पूरी हुई थी पार्वती माता की तपस्या

  • "भगवान विष्णु ने किया माता पार्वती से छल"

  • "कैसे शेर बना मां दुर्गा की सवारी

  • "कैसे पड़ा भगवान शिव का नाम त्रिपुरारी?"

  • "कैसे बना मूषक भगवान गणेश की सवारी"

  • "भगवान विष्णु ने क्यों किया पतिव्रता वृंदा के साथ छल"

  • "मां दुर्गा ने कैसे तोड़ा देवताओं का घमंड?"

  • "शिव की महिमा अपरम्पार"

  • ""रक्षाबंधन" से जुड़ी कहानियां"

  • "गौ सेवा का फल"

  • "मां लक्ष्मी ने क्यों तोड़ा भगवान विष्णु का वचन ?"

  • "जन्माष्टमी:- कान्हा की जन्म कथा"

  • "रामकृष्ण परमहंस के आत्म-ज्ञान की कथा

  • "भगवान शिव ने कैसे किया कृष्ण के बालरुप का दर्शन ?"

  • "क्यों लिया भोलेनाथ ने वृषभ का अवतार?"

  • "मुश्किल कार्य को करें आसान गणपति"

  • "तुलसी क्यों वर्जित हैं गणेश जी की पूजन से?"

  • "भगवान विष्णु ने क्यों लिया मोहिनी अवतार"

  • "माता अंजना को कैसे मिली मुक्ति वानर अवतार से"

  • "कैसे हुई गंगा मां की उत्पत्ति?"

  • "क्यों पूजा जाता है सर्वप्रथम भगवान गणेश को"

  • "भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी को क्यों दिया दंड"

  • "महादेव के अर्द्धनारीश्वर अवतार की कथा"

  • "क्यों कहलातें है पंचरुपी हनुमान"

  • "हिंदी है देश की शान"

  • "मां शैलपुत्री की क्यों होती है प्रथम पूजा"

  • "मां शैलपुत्री की क्यों होती है प्रथम पूजा"

  • नवरात्रि के दूसरे दिन क्यों होती है मां ब्रह्मचारिणी की पूजा ?

  • "देवी का पांचवा स्वरूप - स्कंदमाता"

  • "कात्यायनी - मां शक्ति का छठा स्वरूप"

  • मां कालरात्रि

  • मां महागौरी - दुर्गा का अाठवां रूप

  • नवरात्र के नौंवे दिन करें "मां सिद्धिदात्री" की उपासना

  • "कैसे बने ध्रुव, ध्रुव तारा ?"

  • "शरद पूर्णिमा की व्रथ कथा और पूजा विधि"

  • “चंद्रदेव के तप से कैसे बना सोमनाथ ज्योतिर्लिंग”

  • “जब पहली बार मिले हनुमान और भगवान राम”

  • "मोहिनी और विष्णु भक्त रुक्मांगद की कहानी"

  • धनतेरस: जानिए क्या है शुभ मुहूर्त ?

  • नरक चतुर्दशी पर कैसे हुआ नरकासुर का अंत ?

  • "भाई दूज - किस समय करें भाई को टिका"

  • “मां रेणुका और परशुराम का अद्धभूत मिलन”

  • "क्या है, पृथ्वी पर भूकंप आने का कारण"

  • "क्यों मनाई जाती है गोपाष्टमी"

  • "देवताओं के तेज से कैसे अवतरित हुई मां दुर्गा"

  • "तुलसी विवाह कैसे करें, व्रत कथा और पूजा विधि"

  • "क्यों काटा भैरव ने बह्मा का सर"

  • "देवी सरस्वती के हाथ में क्यों होती है वीणा"

  • "गुरू नानक ने यज्ञोपवीत संस्कार के लिए क्यों किया मना"

  • "गुरुनानक जी की सीख - ईमानदारी से जीना चाहिए"

  • "द्रौपदी कैसे बनी पांच पतियों की पत्नी"

  • "क्यों दिया भगवान श्री कृष्ण अपने बेटे को श्राप"

  • "देवी भगवती का रुप देख कर, क्यों महादेव घबरा गए"

  • तुलसीदास को क्यों समझा ढोंगी

  • "क्यो श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र को ही चुना"

  • "क्यों लेना पड़ा मां दुर्गा को भ्रामरी देवी का अवतार"

  • "बीमारी में कैसे रखें दूसरों का ख्याल"

  • नंदी ने क्यों की भगवान शिव की आराधना

  • "क्या है उत्पन्न एकादशी"

  • "भृगु ऋषि ने क्यों मारी भगवान विष्णु के सीने पर लात"

  • "कर्ण को कैसे प्राप्त हुआ विजय धनुष"

  • "क्यों उठाना पड़ा श्रीकृष्ण को महाभारत में अस्त्र"

  • "अर्जून क्यों गए 12 वर्ष के लिए वनवास"

  • "अर्जून क्यों गए 12 वर्ष के लिए वनवास"

  • “भारत के वो रहस्यमयी मंदिर, जहां बढ़ रहा शिवलिंग का आकार”

  • "क्यों लिया था भगवान गणेश ने विघ्नराज का अवतार"

  • "कैसे बना था श्रीराम और सीता माता के विवाह का संयोग"

  • "कैसे हुआ श्रीगणेश का विवाह"

  • "क्या है गीता जयंती का महत्व"

  • "सुध महादेव मंदिर का रहस्य"

  • "कैसे बने हनुमान बलशाली"

  • "सच्चा सुख संतोष में है"

  • "तीर्थस्थान अमरनाथ के कबूतरों का क्या है रहस्य"

  • "क्यों किया था विभीषण ने गणेश जी पर वार"

  • "जानिए कैसे करें संकष्टी गणेश चतुर्थी की पूजा"

  • सत्यभामा ने श्रीकृष्ण को क्यों तौला ?

  • "क्यों कहा श्रीकृष्ण ने की अपनी मुसीबतों का सामना करो"

  • "क्यों लिया मां दुर्गा ने भ्रमरी देवी का अवतार"

  • "क्यों मनाई जाती है वसंत पंचमी"

  • "क्यों किया भगवान विष्णु ने वृंदा के साथ छल"

  • महाशिवरात्रि की पूजा का क्या है महत्त्व

  • "माता सीता ने क्यों निगला लक्ष्मण को"

  • "शेर क्यों है माता रानी की सवारी"

  • श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए महादेव क्यों बने साधु

  • रावण की लंका की चमक को किसने किया फीका

  • "भगवान शिव और असावरी देवी का क्या था रिश्ता?"

  • "हनुमान जी ने क्यों और किससे किया विवाह ?"

  • "कैसे हुई भगवान गणेश की शादी"

  • "महादेव के अद्भुत अवतार"

  • कब से शुरु हो रही है नवरात्रि ?

  • नवरात्रि की प्रथम देवी - शैलपुत्री

  • ब्रह्मचारिणी : मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप

  • नौ देवी नौ रहस्य:- मां कात्यायनी

  • क्यों मनाया जाता है धनतेरस का त्योहार

  • दीपावली - हिंदू धर्म का सबसे बड़ा त्योहार

  • हनुमान जी से जानिए सफलता के सूत्र

  • बुद्धि के देवता गणेश
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