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|चैतन्य महाप्रभु, वाल्मीकि और शंकराचार्य के आविर्भाव की कथा

देवगुरु बृहस्पति ने कहा - देवेंद्र ! प्राचीन काल में किसी समय वेदपारंगत विष्णुशर्मा नाम के एक ब्राह्मण थे । वे प्रसन्नचित्त से सर्वदेवमय विष्णु की पूजा करते थे, इसलिए देवतालोक भी उनकी प्रतिष्ठा करते थे, इसलिए देवतालोग भी उनकी प्रतिष्ठा करते थे । वे भिक्षावृत्ति से जीवननिर्वाह करते थे, उनकी स्त्री थी किंतु कोई पुत्र न था । एक समय उनके घर पर कोई अतिथि आया । दयालु हृदय उस महात्मा ने विष्णु शर्मा की स्त्री की आर्थिक स्थिति तथा नम्रता देख उसे तीन दिनों के लिए पारसमणि दी और कहा कि इसके स्पर्श से लोहा भी सोना हो जाता है । इतने दिनों में मैं सरयू में स्नान कर तुम्हारे पास लौट आऊंगा । उसके जाने पर ब्राह्मणी ने उस मणि से पर्याप्त सोना तैयार कर लिया । तब तक विण्णु शर्मा भी आ गये । उन्होंने अपार सुवर्ण राशि से संपन्न अपनी पत्नी को देखकर कहा - ‘जहां वह पारसमणिका स्वामी गया है, तुम भी वहीं चली जाओ । मैं अकिंचन हूं, विष्णुभक्त हूं । चोर - डाकुओं के भय से धन का संग्रह नहीं करता ।’ इस पर उनकी पतिव्रता पत्नी डर गयी और पारसमणि उसे समर्पित कर पुन: उनकी सेवा में तत्पर हो गयी । ब्राह्मण विष्णुशर्मा ने उस सारे धन एवं पारस को घर्घरा - सरयू नदी में फेंक दिया । तीन दिनों के बाद उस अतिथि ने आकर ब्राह्मणी से पूछा कि क्या तुमने पारसमणि से सोना नहीं बनाया ? उसने कहा - ‘मेरे पति ने उसे क्रोधपूर्वक ग्रहणकर घाघरा में फेंक दिया । उस दिन से मैं जिस किसी प्रकार लोहे के बर्तनों के अभाव में आग में ही भोजन बना रही हूं ।’

यह सुनकर वह यति आश्चर्यचकित हो गया । दिनभर वहीं रुका रहा । संध्यासमय ब्राह्मण के आने पर उसने रुक्षस्वर में कहा - ‘ब्राह्मण ! तुम दैवद्वारा मोहित प्रतीत होते हो, क्योंकि तुम दरिद्र भी हो और धन भी संग्रह नहीं करना चाहते हो । अत: मेरा पारस शीघ्र ही लौटा दो, नहीं तो मैं अपना प्राण त्याग दूंगा ।’ यति के इस प्रकार कहने पर विष्णु शर्मा ने कहा - ‘तुम घाघरा के किनारे जाओ, वहीं तुम्हारा पारस मिल जाएंगा ।’ यह कहकर यति के साथ वहां जाकर उसने बहुत से कंटकों से ढके अनेक पारसमणियों को उसे दिखाया । उस यति ने ब्राह्मण को नमस्कार कर नम्रतापूर्वक कहा - ‘मैंने बारह वर्षों तक भलीभांति शिव की आराधना की, तब मैंने इस शुभ रत्न को प्राप्त किया । विप्रश्रेष्ठ ! आपके दर्शनमात्र से ही मुझ लोभात्मा ने आज अनेकों पारसमणियों को प्राप्त कर लिया ।’ यह कहकर उससे शुभ ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त कर लिया । इधर विष्णु शर्मा ने एक हजार वर्षों तक पृथ्वी पर रहकर सूर्य की आराधना करके विष्णु लोक को प्राप्त किया । वे ही विष्णुशर्मा वैष्णव तेज धारणकर फाल्गुन के महीने में तीनों लोकों में तप रहे हैं और देवकार्य सिद्ध कर रहे हैं ।

देवेंद्र ! फाल्गुन मास में उन सूर्य की आराधना कर तुम भी सुक प्राप्त करो । उन्होंने देवताओं के साथ ऐसा ही किया । प्रसन्न हो भगवान सूर्य सूर्यमण्डल से प्रकट होकर सभी देवताओं के देखते - देखते इंद्र के शरीर में प्रविष्ट हो गये । उस तेज से इंद्र ने अपना शरीर अयोनिज विप्ररूप में धारण किया और शचीदेवी भी पृथ्वी में ब्राह्मणी के रूप में अवतीर्ण हुईं । एक वर्ष के बाद शचीदेवी के गर्भ से भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में गुरुवार को द्वादशी तिथि में ब्राह्मवेला में एक दिव्य बालक का जन्म हुआ । जो वास्तव में भगवान विष्णु के कलावतार थे । उस समय रुद्र, वसु, विश्वेदेव, मरुद्गण, साध्य, सिद्ध तथा भास्कर आदि देवों ने उस सनातन हरिरूप बालक की दिव्य स्तुति की और कलियुग में दितिपुत्रों द्वारा पीड़ित देवताओं तथा अधर्म से दु:खी पृथ्वी का उद्घार करने के लिए प्रार्थना की । यहीं आगे चलकर श्रीकृष्णचैतन्य के नाम से विख्यात हुए ।

सूतजी बोले - मुने ! स्तुति के अनन्तर सभी देवगण बृहस्पति के पास आकर कहने लगे - महाभाग ! हम सभी रुद्रगण, ये वसुगण तथा अश्विनीकुमार पृथ्वी पर किस किस अंशरूप में अवतरित होंगे, इसे आप बतलाने की कृपा करें ।

बृहस्पति ने कहा - देवगणों ! इस विषय में आप लोगों को मैं एक दूसरी बात बता रहा हूं - प्राचीन काल में मृगव्याध नाम का एक अधम ब्राह्मण था । वह मार्ग में सदा धनुर्बाण धारणकर विप्रों की हिंसा किया करता था । वह महामूर्ख ब्राह्मणों को मारकर उनके यज्ञोपवीतों को ग्रहणकर उत्साहपूर्वक शोर मचाता था । वह दुष्ट द्विजाधम तीनों वर्णों को, विशेषकर ब्राह्मणों को मारता था । उस समय ब्राह्मणों का विनाश देखकर देवगण भयभीत हो ब्रह्मा के पास आये और सभी बातें उन्हें बतायीं । यह सुनकर दु:खी हो ब्रह्मा ने सभी लोकों में गमन करनेवाले सप्तर्षियों से कहा - ‘द्विजोत्तमो ! आप सभी वहां जाकर मृगव्याध को समझायें ।’ यह सुनकर वसिष्छ आदि ऋषियों के साथ मरीचि मृगव्याध के वन में गये । धुनर्बाणधारी महाबली मृगव्याध ने उन लोगों को देखकर भयंकर वचन कहा - ‘आज मैं तुमलोगों को मारूंगा ।’ मरीचि आदि ने हंसकर कहा - ‘तुम हमलोगों को क्यों मारोगे ? कुल क् लिए मारोगे या अपने लिए, यह शीघ्र बताओ ।’ यह सुनकर उस मृगव्याध ने कहा - ‘मैं अपने कुल के लिए और अपने कल्याण के लिए (तुमलोगों को) मारूंगा ।’

यह सुनकर उन लोगों ने कहा - ‘धनुर्धर ! अपने घर में यह पूछकर शीघ्र आओ कि विप्रहत्या से किये गये पापों को कौन भोगेगा ? यह विचार करो ।’ यह सुनकर उस घोरात्मा ने अपने कुलवालों से पूछा - ‘आजतक मैंने जो पाप अर्जित किया है, उसे तुमलोग भी वैसे ही ग्रहण करो, जैसे धन को ग्रहण किया है ।’ उस अधम ब्राह्मण के इस वचन को सुनकर उसके कुटुंबियों ने कहा - ‘हमलोग तुम्हारे किये गये पाप को ग्रहण नहीं करेंगे, क्योंकि यह भूमि और ये सूर्य साक्षी हैं, हमलोगों ने कोई पाप नहीं किया है ।’ यह सुनकर उस मृगव्याध ने मुनियों के पास जाकर हाथ जोड़कर कहा - ‘महात्माओ ! जिस प्रकार मेरे पापों का क्षय हो, आपलोग वैसा उपाय बतायें ।’ मृगव्याध के यह कहने पर ऋषियों ने कहा - ‘एक उत्तम मंत्र है, उसे सुनो - वह है ‘राम का नाम ।’ यह सभी प्रकार के पापों को दूर करने वाला है । अब हमलोग जा रहे हैं, जबतक वापस तुम्हारे पास न आ जाएं, तबतक तुम इस महामंत्र अर्थात् राम नाम का जप करो ।’ यह कहकर मुनिगण तीर्थान्तरों में भ्रमण करने चले गये और वह मूर्ख व्याध विप्र ‘मरा मरा’ का हजार वर्ष तक निरंतर जप करता रहा । उसके जप के प्रभाव से वह अरण्य उत्पलों (कमलों) से परिव्याप्त हो गया और तभी से वह स्थान पृथ्वी पर उत्पलारम्य के नाम से प्रसिद्ध हो गया ।

अनन्तर सप्तर्षि वाल्मीकि बने उस मृगव्याध के पास आये और उसकी मिट्टी हटाकर उसको शुद्ध विप्रके रूप में देखकर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे - ‘वाल्मीक से निकलने के कारण तुम वाल्मीकि कहे जाओगे । त्रिकालज्ञ महामति हे विप्र ! तुम इसी नाम से प्रसिद्ध होओगे ।’ यह कहकर वे सप्तर्षि अपने अपने स्थानपर चले गये । वाल्मीकिमुनि ने अष्टादश कल्पसमंवित शतकोटिवस्तृत तथा सभी पापों का विनाशक निर्मल पद्यबंध रामायण का निर्माण किया । अनन्तर वे शिव होकर वहीं निवास करने लगे । देवगणों ! हर को प्रिय लगनेवाले उस मृगव्याप्त शिव के चरित्र को आप लोग सुनें ।

वैवस्वत मन्वन्तर के आद्य सत्ययुग में ब्रह्मा ने उत्पलारण्य में आकर एक यज्ञ किया । उस समय वहां पर सरस्वती देवी नदी होकर आ गयीं । अनन्तर ब्रह्मा ने अपने मुख से कल्याणकारी ब्राह्मणों, बाहुओं से क्षत्रियों, ऊरु से उत्तम वैश्यों और पैरों से शुभाचारसंपन्न शूद्रों को उत्पन्न किया । द्विजराज सोम (चंद्रमा), सूर्य, तेज वीर्य की रक्षा करनेवाले कश्यप, मरीचि, रत्नाकर अर्थात् समुद्र एवं प्रजापति आदि को भी उत्पन्न किया । दक्ष के मन से अनेक कन्याएं उत्पन्न हुईं । विष्णुमाया के प्रभाव से वे कलाओं के रूप में पृथ्वी पर स्थित हुईं । भगवान ब्रह्मा ने अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्र लोक की अभिवृद्धि के लिये सोम को तथा तेरह अदिति आदि कन्याएं कश्यप को और कीर्ति आदि कन्याएं धर्म को प्रदान कीं । उन्होंने वैवस्वत मन्वन्तर में अनेक सृष्टियां कीं । ब्रह्मा की आज्ञा के अनुसार पृथ्वी पर दक्ष उन लोगों के प्रजापति हुए । यज्ञ में तत्पर दक्ष प्रजापति ने स्वयं वहां निवास किया । सभी देवगण दक्ष को नमस्कार कर वहां विचरण करते थे, किंतु भूतनाथ महादेव ने कभी उनको नमस्कार नहीं किया । इससे क्रुद्ध होकर दक्ष ने यज्ञ में उन्हें भाग नहीं दिया ।

मृगव्याध शिव क्रुद्ध होकर वीरभद्र के रूप में प्रकट हो गये । उनके साथ त्रिशिरा, त्रिनेत्र और त्रिपद शिवगण भी वहां आये । वीरभद्र आदि के द्वारा देव, मुनिगण और पितृगण पीड़ित होने लगे । उस समय यज्ञपुरुष भयभीत हो मृग होकर शीघ्रता से भागने लगा । तब शिव ने व्याधरूप को धारण किया । रुद्ररूपी व्याध के द्वारा वह मृग छिन्न भिन्न अंगवाला हो गया । तब भगवान ब्रह्मा ने मधुर स्तुतियों से रुद्रव्याध को संतुष्ट किया । संतुष्ट मृगव्याध ने दक्ष के यज्ञ को पूर्ण कराया । तुलाराशि में सूर्य के आनेपर उस रुद्र को सत्ताईस नक्षत्रवाले चंद्रमण्डल में स्थापित कर स्वयं ब्रह्मा सत्यलोक को चले गये और रुद्र चंद्र के समान रूपवान हो गये । वीरभद्र रुद्र ने यह सुनकर प्रसन्नचित्त हो अपने शरीर से एक तेज को उत्पन्न कर भैरवदत्त नामक विप्रके घर में भेजा । घोर कलियुग में वहीं शिव शंकर (शंकराचार्य) नाम से उसके पुत्ररूप में अवतरित हुए । वह बालक गुणवान, सकल शास्त्रवेत्ता एवं ब्रह्मचारी हुआ । उसने शांकरभाष्य की रचना कर शैवमत को प्रतिष्ठित किया और त्रिपुण्ड्र, अक्ष (रुद्राक्ष) माला और पञ्चाक्षर मंत्र प्रदान किया ।

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  • सबसे बड़ा संयम है मौन

  • काशी के लोलार्क कुंड में विराजते हैं सूर्य

  • दैत्यराज विरोचन की दानशीलता

  • मर्यादा पालन क्यों ?

  • कन्हैया द्वारा शालग्राम की चोरी

  • योगमाया की भविष्यवाणी

  • बाल समय रबि भक्षि लियो

  • केवट के भाग्य

  • चित्रकूट की अद्भुत शोभा

  • समुद्रोल्लंघन की तैयारी

  • जानिए संकटमोचन हनुमान के जन्म की कथा

  • आखिर कैसे हुआ था भीष्म पितामह का जन्म

  • गंगापुत्र देवव्रत का नाम भीष्म कैसे पड़ा?

  • जब कुबेर को खुद पर होने लगा अंहकार

  • धर्म का रहस्य

  • प्रेम में है अपार शक्ति

  • अखंड सौभाग्य के लिए करें हरतालिका तीज व्रत

  • श्री गणेश से गजानन बनने की कहानी

  • कुरूपता सुंदरता के वस्त्र पहनकर चलती बनी

  • भगवती के दुर्गा नाम का इतिहास

  • भगवान गणेश के 8 अति प्राचीन मंदिर

  • विनम्रता में छुपा जीवन की सफलता रहस्य

  • जानिए श्राद्ध में क्या है पिंड दान का महत्त्व

  • जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत महिमा

  • मां शैलपुत्री

  • कलश स्थापना कैसे करें ?

  • मां ब्रह्मचारिणी

  • मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप- मां चंद्रघंटा

  • नवरात्र का चौथा दिन मां कूष्मांडा देवी

  • नवदुर्गा का पांचवां स्वरूप स्कंदमाता

  • कात्यायनी : मां दुर्गा का छठवां स्वरूप

  • नवरात्रि के सातवें दिन होती है होती है मां कालरात्रि की पूजा

  • शाकंभरी अवतार

  • नवरात्र के अाठवें दिन होता है मां महागौरी का पूजन

  • सिद्धिदात्री : मां दुर्गा का नौवां रूप

  • विजय दशमी

  • भावनाओं से ही तय होता है मनुष्य का भाग्य

  • जीत हमेशा सत्य की होती है

  • कार्तिक मास का महत्त्व

  • श्रीरामचरितमानस (लंकाकाण्ड)

  • करवा चौथ व्रत की पूजन विधि

  • करवा चौथ व्रत की कथा

  • गलतियों को सुधारने से जीवन आदर्श बनता है।

  • तो इसलिए पूजनीय है शमी वृक्ष

  • स्वार्थरहित होकर किया गया दान ही श्रेष्ठ

  • बिल्व वृक्ष का महत्त्व जानकर हैरान हो जाएंगे आप।

  • माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप

  • दीर्घजीवी होने का रहस्य विनम्रता में निहित

  • क्यों मनाया जाता है धनतेरस का त्योहार

  • चाणक्य नीति की कुछ महत्त्वपूर्ण बातें

  • आपका चरित्र ही सबसे बड़ा गुण है।

  • खुद कष्ट सहकर बगुले ने उपकार का बदला चुकाया

  • देवउठनी एकादशी आज

  • मार्गशीर्ष श्रीकृष्ण का स्वरूप

  • आशीर्वाद के लिए पैर ही क्यों छुआ जाता है?

  • खुशी तो मन में छुपी है।

  • आत्मा में निहित असली सौंदर्य

  • सत्संग का प्रभाव

  • सेहत का राज

  • संगत का असर

  • सोते वक्त किस दिशा में रखना चाहिए सिर और पैर ?

  • क्यों हैं श्रीविष्णु क्षीरसागर में?

  • नलकुबेर ने दिया था रावण को श्राप

  • बर्तन से पैदा हुए थे गुरु द्रोणाचार्य

  • सेवा भाव सभी धर्मों से ऊपर

  • मां के 51 शक्तिपीठों की एक पौराणिक कथा

  • पूजा-पाठ करने की सही तरीका

  • ऐसे करें गणेश जी की पूजा

  • पुण्यदायक है माघ स्नान

  • श्रीयंत्र है मां लक्ष्मी को परम प्रिय

  • क्यों मनाते है मकर संक्रांति, क्या है महत्त्व

  • रामचरितमानस

  • धैर्य का फल

  • तिल के फायदें

  • अनोखी शिक्षा

  • शादी से समय क्यों लेते है अग्नि के सात फेरे

  • श्रेष्ठ कौन

  • मौनी अमावस्या आज

  • कर्म की महिमा

  • हर एक को अपना दु:ख सबसे बड़ा लगता है

  • सरस्वती को वाणी की देवी क्यों कहते हैं?

  • जानिये मां सरस्वती का जन्म कैसे हुआ..

  • जानें क्या है तुलसी के पौधे का महत्त्व

  • निर्विकार भाव से मिलता है सुख

  • क्षमाशीलता

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  • वक्रतुण्ड अवतार

  • क्यों मनाई जाती है शिवरात्रि

  • ज्ञानी बने पर अंहकारी न बने

  • जानिए क्या है होलाष्टक

  • असली सुंदरता हमारे अच्छे कार्यों से आती है।

  • पूजा में केले के पत्तों को क्यों महत्व दिया जाता है?

  • आज है शनि प्रदोष व्रत

  • अष्टमी पर करें मां महागौरी की उपासना

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  • महात्मा विदुर की अंतिम इच्छा

  • श्री राम के साथ करें, भगवान शिव की उपासना

  • जानिए कर्ण को क्यों मिला श्राप

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  • आप भी कर लें संकटमोचन को प्रसन्न

  • हनुमान अष्टक

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  • श्रीगणेश के 11 नाम

  • तो इसलिए मनाते है बैसाखी

  • जलियांवाला बाग कांड की कुछ बड़ी बातें जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता

  • हिंदू धर्म की कुछ महत्वपूर्ण बातें जिसे आपको भी जानना चाहिए

  • परब्रह्म शिव ही परमात्मा हैं

  • श्रीकृष्ण को श्राप से बचाने के लिए सुदामा ने स्वीकारी थी उम्रभर की दरिद्रता

  • हनुमानजी के पुत्र मकरध्वज की उत्पत्ति की कथा

  • कपूर के है अनेकों फायदे

  • शनिवार को क्यों चढ़ाते हैं शनि देव को तेल

  • कुरुचिपूर्ण स्वभाव से बचें

  • शिव को क्यों प्रिय है भांग

  • दूसरों के हिस्से का भोजन न खाएं

  • जानिए महात्मा विदुर ने किन 6 चीजों का होना भाग्यशाली बताया है।

  • जो है उसमें खुश रहना सीखें

  • निंदक नियरे राखिए

  • क्यों मनाते हैं अक्षय तृतीया

  • गंगा सप्तमी आज

  • कन्या दान का महत्त्व

  • जानिए कौन सा फूल चढ़ाने से कौन से भगवान होते हैं प्रसन्न?

  • भगवान विष्णु के दस अवतार 1.मत्स्यावतार

  • भगवान विष्णु के दस अवतार:-

  • भगवान विष्णु के दस अवतार:- वराहावतार

  • भगवान विष्णु के दस अवतार:- नृसिंह अवतार

  • अपने आप को मुश्किलों से बड़ा बनाएं

  • भगवान विष्णु के दस अवतार:- वामन अवतार

  • कर्म की गति और मनुष्य के मोह

  • हमारी संस्कृति में यज्ञ का महत्व

  • जानिए किसने की थी निर्जला एकादशी की शुरुआत

  • भगवान गणेश को क्यों नहीं चढ़ाते तुलसी ?

  • क्यों है ब्रह्मा जी का भारत में एक मंदिर ?

  • कैसे हुई थी रुद्राक्ष की उत्पत्ति ?

  • रावण के तीन गुणकारी मंत्र

  • "नंदी के अबोध आचरण ने किया भोलेनाथ को क्रोधित"

  • "भगवान शिव के चार साथी"

  • "हनुमान जी ने सुनी अंजलि की पुकार"

  • आज है हरियाली तीज, 108वें जन्म मे पूरी हुई थी पार्वती माता की तपस्या

  • "भगवान विष्णु ने किया माता पार्वती से छल"

  • "कैसे शेर बना मां दुर्गा की सवारी

  • "कैसे पड़ा भगवान शिव का नाम त्रिपुरारी?"

  • "कैसे बना मूषक भगवान गणेश की सवारी"

  • "भगवान विष्णु ने क्यों किया पतिव्रता वृंदा के साथ छल"

  • "मां दुर्गा ने कैसे तोड़ा देवताओं का घमंड?"

  • "शिव की महिमा अपरम्पार"

  • ""रक्षाबंधन" से जुड़ी कहानियां"

  • "गौ सेवा का फल"

  • "मां लक्ष्मी ने क्यों तोड़ा भगवान विष्णु का वचन ?"

  • "जन्माष्टमी:- कान्हा की जन्म कथा"

  • "रामकृष्ण परमहंस के आत्म-ज्ञान की कथा

  • "भगवान शिव ने कैसे किया कृष्ण के बालरुप का दर्शन ?"

  • "क्यों लिया भोलेनाथ ने वृषभ का अवतार?"

  • "मुश्किल कार्य को करें आसान गणपति"

  • "तुलसी क्यों वर्जित हैं गणेश जी की पूजन से?"

  • "भगवान विष्णु ने क्यों लिया मोहिनी अवतार"

  • "माता अंजना को कैसे मिली मुक्ति वानर अवतार से"

  • "कैसे हुई गंगा मां की उत्पत्ति?"

  • "क्यों पूजा जाता है सर्वप्रथम भगवान गणेश को"

  • "भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी को क्यों दिया दंड"

  • "महादेव के अर्द्धनारीश्वर अवतार की कथा"

  • "क्यों कहलातें है पंचरुपी हनुमान"

  • "हिंदी है देश की शान"

  • "मां शैलपुत्री की क्यों होती है प्रथम पूजा"

  • "मां शैलपुत्री की क्यों होती है प्रथम पूजा"

  • नवरात्रि के दूसरे दिन क्यों होती है मां ब्रह्मचारिणी की पूजा ?

  • "देवी का पांचवा स्वरूप - स्कंदमाता"

  • "कात्यायनी - मां शक्ति का छठा स्वरूप"

  • मां कालरात्रि

  • मां महागौरी - दुर्गा का अाठवां रूप

  • नवरात्र के नौंवे दिन करें "मां सिद्धिदात्री" की उपासना

  • "कैसे बने ध्रुव, ध्रुव तारा ?"

  • "शरद पूर्णिमा की व्रथ कथा और पूजा विधि"

  • “चंद्रदेव के तप से कैसे बना सोमनाथ ज्योतिर्लिंग”

  • “जब पहली बार मिले हनुमान और भगवान राम”

  • "मोहिनी और विष्णु भक्त रुक्मांगद की कहानी"

  • धनतेरस: जानिए क्या है शुभ मुहूर्त ?

  • नरक चतुर्दशी पर कैसे हुआ नरकासुर का अंत ?

  • "भाई दूज - किस समय करें भाई को टिका"

  • “मां रेणुका और परशुराम का अद्धभूत मिलन”

  • "क्या है, पृथ्वी पर भूकंप आने का कारण"

  • "क्यों मनाई जाती है गोपाष्टमी"

  • "देवताओं के तेज से कैसे अवतरित हुई मां दुर्गा"

  • "तुलसी विवाह कैसे करें, व्रत कथा और पूजा विधि"

  • "क्यों काटा भैरव ने बह्मा का सर"

  • "देवी सरस्वती के हाथ में क्यों होती है वीणा"

  • "गुरू नानक ने यज्ञोपवीत संस्कार के लिए क्यों किया मना"

  • "गुरुनानक जी की सीख - ईमानदारी से जीना चाहिए"

  • "द्रौपदी कैसे बनी पांच पतियों की पत्नी"

  • "क्यों दिया भगवान श्री कृष्ण अपने बेटे को श्राप"

  • "देवी भगवती का रुप देख कर, क्यों महादेव घबरा गए"

  • तुलसीदास को क्यों समझा ढोंगी

  • "क्यो श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र को ही चुना"

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  • "बीमारी में कैसे रखें दूसरों का ख्याल"

  • नंदी ने क्यों की भगवान शिव की आराधना

  • "क्या है उत्पन्न एकादशी"

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  • "कर्ण को कैसे प्राप्त हुआ विजय धनुष"

  • "क्यों उठाना पड़ा श्रीकृष्ण को महाभारत में अस्त्र"

  • "अर्जून क्यों गए 12 वर्ष के लिए वनवास"

  • "अर्जून क्यों गए 12 वर्ष के लिए वनवास"

  • “भारत के वो रहस्यमयी मंदिर, जहां बढ़ रहा शिवलिंग का आकार”

  • "क्यों लिया था भगवान गणेश ने विघ्नराज का अवतार"

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  • "कैसे हुआ श्रीगणेश का विवाह"

  • "क्या है गीता जयंती का महत्व"

  • "सुध महादेव मंदिर का रहस्य"

  • "कैसे बने हनुमान बलशाली"

  • "सच्चा सुख संतोष में है"

  • "तीर्थस्थान अमरनाथ के कबूतरों का क्या है रहस्य"

  • "क्यों किया था विभीषण ने गणेश जी पर वार"

  • "जानिए कैसे करें संकष्टी गणेश चतुर्थी की पूजा"

  • सत्यभामा ने श्रीकृष्ण को क्यों तौला ?

  • "क्यों कहा श्रीकृष्ण ने की अपनी मुसीबतों का सामना करो"

  • "क्यों लिया मां दुर्गा ने भ्रमरी देवी का अवतार"

  • "क्यों मनाई जाती है वसंत पंचमी"

  • "क्यों किया भगवान विष्णु ने वृंदा के साथ छल"

  • महाशिवरात्रि की पूजा का क्या है महत्त्व

  • "माता सीता ने क्यों निगला लक्ष्मण को"

  • "शेर क्यों है माता रानी की सवारी"

  • श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए महादेव क्यों बने साधु

  • रावण की लंका की चमक को किसने किया फीका

  • "भगवान शिव और असावरी देवी का क्या था रिश्ता?"

  • "हनुमान जी ने क्यों और किससे किया विवाह ?"

  • "कैसे हुई भगवान गणेश की शादी"

  • "महादेव के अद्भुत अवतार"

  • कब से शुरु हो रही है नवरात्रि ?

  • नवरात्रि की प्रथम देवी - शैलपुत्री

  • ब्रह्मचारिणी : मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप

  • नौ देवी नौ रहस्य:- मां कात्यायनी

  • क्यों मनाया जाता है धनतेरस का त्योहार

  • दीपावली - हिंदू धर्म का सबसे बड़ा त्योहार

  • हनुमान जी से जानिए सफलता के सूत्र

  • बुद्धि के देवता गणेश
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