संत गुरु
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|स्वामी अवधेशानंद गिरी जी

स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज पूर्ण रूप से आत्मा की ज्योति से परिपूर्ण हैं। आनंद, पवित्रता और पुण्य की आभा से परिपूर्ण स्वामी अवधेशानंद गिरि जी हिंदू धर्म की साक्षात मूर्ति हैं। आचार्य महामंडलेश्वर जूनापीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज हजारों लोगों के लिए एक गुरु और लाखों लोगों के लिए एक प्रेरणा हैं। स्वामी अवधेशानंद गिरि जी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन एक विद्वान ब्राह्मण परिवार में हुआ। बालपन में उन्हें न खिलौनों में दिलचस्पी थी, न दोस्ती आदि में। अपने परिजनों से अक्सर वह पूर्व जन्म की घटनाओं की चर्चा करते थे। ढाई वर्ष की आयु में उन्होंने वैराग्य धारण कर घर छोड़ दिया था, मगर परिवार के लोग समझा-बुझाकर उन्हें घर ले आए। जब वे हाई स्कूल की नौवीं कक्षा में थे तब योग के क्षेत्र में एक साधु की सिद्धियों का साक्षी बनने का पहली बार अवसर मिला।
उस वर्ष गर्मी की छुट्टियों के दौरान स्वामीजी आध्यात्मिक अध्ययन और योगाभ्यास के लिए कुछ समय बिताने एक आश्रम चले गए। एक रात इसी आश्रम में, उन्होंने लगभग एक फुट जमीन के ऊपर हवा में उड़ते हुए एक योगी को देखा। आश्रम के अधिकारियों को जब इस युवा लड़के के बारे में पता चला कि उसने सिद्ध योगी की साधना को देख लिया है तो उनको दोबारा ऐसा न करने को चेताया, परंतु उस सिद्ध योगी ने कहा कि इस बच्चे ने क्या गलत किया है? वैसे भी एक साधु बनने जा रहा है। इस तरह उन्होंने पहले ही बता दिया था की ये भी आगे चल कर सिद्ध गुरु ही बनेगे | कालेज में उनकी सक्रियता वाद-विवाद, कविताओं अथवा प्रार्थना आदि में होती थी। सन् 1980 में हिमालय की कंदराओं में उन्होंने गहन साधना की और इसके साथ ही उन्होंने संन्यास जीवन में पूरी तरह से कदम रखा। हिमालय के निचले पर्वतमाला में महीनो भटक कर उन्होंने पाया की उन्हें मार्गदर्शन करने के लिए एक गुरु की आवश्यकता है। इसी दौरान उनका स्वामी अवधूत प्रकाश महाराज से मिलना हुआ जिन्होंने अपने आपको खोज लिया था और योग में विशेषज्ञ, और वेद और अन्य ज्ञान में बहुमुखी हो चुके थे। अवधेशानन्द जी को मानो साक्षात् भगवन ही मिल गए हों। वहीं से उनकी आत्म-साक्षात्कार की यात्रा की शुरुआत हुई |

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